श्री गणेशाय नमः साथियों इस सीरीज को पढ़ने से पहले आप यह जान लीजिए कि यह भाग हम क्यों लाने जा रहे है , क्योंकि ताजमहल में मंदिर होने का विवाद पहली बार विवाद 1965 में शुरू हो गया था और आज तक इस विषय को टाला जाता रहा है।
आपसे अनुरोध है कि सभी भागों को पूरा पढ़ना है और पढ़ने के बाद अपने विचार जरूर देने है, इसके लिए लोगों ने आर्थिक सहयोग भी किया है आपको तो मुक्त में पढ़ने को मिल रहा है
1965 में आई 'TAJMAHAL THE TRUE STORY' किताब ने ताज को लेकर विवाद खड़ा कर दिया। इसमें ताजमहल को तेजोमहालय बताया गया।
किताब में दावा किया कि ताजमहल की जगह शिवमंदिर था।
TAJ MAHAL-THE TRUE STORY The Tale of a Terle Varabulized PNO किताब में दावा
किया गया कि यहां तेजोमहालय 1155 में मुगलों के शासन
से दशकों पहले बना था।
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इसी किताब का हवाला देते हुए समय-समय पर तमाम हिंदूवादी संगठन ताजमहल को तेजोमहालय होने का
दावा करते हैं और जांच करवाने की मांग करते है लेकिन सरकारें 1960 से ही जांच को टालती आ रही है।
इतिहासकार पीएन ओक ने 1960 से 70 के दशक में
ताजमहल, फतेहपुर सीकरी और लाल किले को लेकर तब
कई किताबें लिखी थीं, उसमें भी ताजमहल को सबूतों के आधार पर ताजमहल को तेजोमहालय सिद्ध किया जा चुका है।
PART 1 ताजमहल नहीं: तेजोमहालय एक शिव मंदिर।
क्या ताजमहल का इतिहास हमें पूरा बताया गया है… या कुछ बातें छुपाई गई हैं?
ताजमहल को लेकर कई ऐसे तथ्य सामने आते हैं, जो आम किताबों में नहीं मिलते
1. ताजमहल नाम का उल्लेख औरंगजेब तक के किसी भी तवारीखों में या दरबारी दस्तावेजों में कहीं भी नहीं मिलता है।
2. इसे ताज-ए-महल याने महलों का ताज कहने का प्रयास करना हास्यास्पद है, क्योंकि यह तो इस्लामी कब्र है। कब्र को कभी भी विश्व में कहीं भी महल न कहा जाता था न कहा जाता है।
3. इसका अंतिम पद ‘महल’ इस्लामी शब्द ही नहीं है, क्योंकि अफगानिस्तान से लेकर अल्जीरिया तक फैले विस्तृत इस्लामी प्रदेशों में ‘महल’ नाम की एक भी इमारत नहीं है।
4. सामान्य धारणा यह है कि इसमें दफनाई महिला मुमताज महल के नामानुसार इसका नाम ताजमहल रखा गया है।
यह दो दृष्टियों से असंगत है। प्रथम बात तो यह है कि शाहजहाँ की उस पत्नी का नाम मुमताज महल नहीं अपितु मुमताज-उल-जमानी था। द्वितीय : मुमताज की स्मृति में बने उस भवन को नामांकित करते समय दो आधे अक्षर ‘मुम’ उड़ा देना हास्यास्पद है।
5. फिर भी उस महिला का नाम मुमताज होने के कारण यदि उससे इमारत का नाम पड़ता तो वह इमारत मुमताजमहल कहलाती, न कि ताजमहल।
6. शाहजहाँ के समय भारत में आए हुए यूरोप के कई पर्यटकों ने इस भवन का उल्लेख ताज-ए-महल नाम से किया है जो शिव मंदिर सूचित करने वाला संस्कृत शब्द तेजोमहालय का बिगड़ा रूप है।
7. कब्र का अर्थ विशाल इमारत नहीं अपितु केवल इमारत के अन्दर स्थित मृतक के शव पर बना टीला होता है।
8. यदि ताजमहल मकबरा होता तो उसे महल नहीं कहा जाता, क्योंकि महल में तो सजीव व्यक्ति ही रहते हैं।
9. चूँकि ताजमहल का उल्लेख शाहजहाँ तथा औरंगजेब-कालीन किसी भी मुगल लेख में नहीं है, ताजमहल के निर्माण का श्रेय शाहजहाँ को देना उचित नहीं है।
ये तो बस शुरुआत है… Part 2 में और बड़े तथ्य
साथियों हमने इस इतिहास को प्रसारित करने के लिए आर्थिक सहयोग मांगा था, अब तक तीन भागो की व्यवस्था हो पाई है, कमेंट बॉक्स में QR कोड दिया है, आगे के भाग भी वायरल हो सके इसलिए आप से अनुरोध है कि कमेंट देखिए।
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PART-2 ताजमहल नहीं, तेजोमहालय एक शिव मंदिर है।
ताजमहल में मंदिर परंपरा के कई साक्ष्य मिले है।
क्या ताजमहल के अंदर आज भी कुछ ऐसी परंपराएं हैं जो सोचने पर मजबूर कर दें? ताजमहल की संरचना और परंपराओं से जुड़े कुछ और तथ्य आपके लिए जरूर पढ़े
10. ताजमहल संस्कृत शब्द तेजोमहालय यानी शिव मंदिर का अपभ्रंश होने से पता चलता है कि अग्रेश्वर महादेव अर्थात अग्रनग सेर के नाथ ईश्वर शंकर जी को यहाँ स्थापित किया गया था।
11. शाहजहाँ के पूर्व समय से जब ताज एक शिव मंदिर था तब से ही जूते खोलकर अन्दर प्रवेश करने की परम्परा आज भी मौजूद है। यदि यह भवन मकबरा ही होता तो इसमें प्रवेश करते समय जूते उतार देने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती बल्कि कब्रिस्तान में तो जूते पहनना आवश्यक होता है।
12. पर्यटक देख सकते हैं कि संगमरमरी तहखानों में बनी मुमताज के कब्र की आधारशिला सादी सफेद है जबकि पड़ोस की शाहजहाँ की कब्र और ऊपरी मंजिल में बनी शाहजहाँ-मुमताज की कब्रों पर हरे बेल-बूटे जुड़े हैं। इससे निष्कर्ष यह निकलता है कि वह सफेद संगमरमरी शिला अलग से बनी थी जो कि मूलतः शिवलिंग की आधारशिला थी।
13. संगमरमरी जाली के शिखर पर बने कलश कुल 108 हैं जो संख्या पवित्र हिन्दू धर्म की परम्परा है। कलश भी हिंदू परंपरा का हिस्सा है, जो कलश है उन पर नारियल भी स्थापित है, साथ ही संख्या 108 भी बहुत महत्व रखती है, हमारे उपनिषद 108 है, हिंदुओं की जपमाला में 108 मनके होते है, मंदिरों में 108 दीपक लगाए जाते है, शरीर में 108 ऊर्जा बिंदु माने गए है, हिंदुओं में 108 में
1= परमात्मा
0= शून्य
8 = अनंत ( infinity का प्रतीक है)
108= ईश्वर+ शून्यता+ अंनतता - पूर्णता माना गया है।
ताजमहल होता तो यह संख्या 726 या कोई और होती ।
14. ताजमहल के संगमरमरी तहखाने के नीचे जो लाल पत्थर की बनी मंजिलें शाहजहाँ द्वारा आबद्ध-खाद चुना दी गई हैं उनमें से कई बार पुरातत्व कर्मचारियों को मूर्तियाँ मिली हैं।
15. भारत वर्ष में कई मुख्य शिव मंदिर है। यह तेजोमहालय याने तथाकथित ताजमहल उनमें से एक है।
16. विश्वकर्मा वास्तुशास्त्र नामक वास्तुकला के विवेचनात्मक प्रसिद्ध ग्रंथ में उल्लिखित विभिन्न प्रकार के शिवलिंगों में तेजोलिंग का उल्लेख करता है।
17. आगरा शहर जहाँ ताजमहल अवस्थित है, प्राचीनकाल से शिवपूजा का केन्द्र रहा है।
18. आगरा की आबादी ज्यादातर जाटों की है। वे भगवान शंकर को तेजाजी कहकर पुकारते हैं।
इतिहास की सच्चाई क्या है — ये जानना जरूरी है
आप Comment में बताए— आप क्या मानते हो, शिवालय या ताजमहल?
अगले भाग- 3 में आपके सामने कुछ दस्तावेज प्रस्तुत करेंगे जो इसे शिव मंदिर साबित करते है... Seemore
PART‑3 ताजमहल नहीं, तेजोमहालय एक शिव मंदिर है।
ताजमहल के बारे में दस्तावेजों के कई साक्ष्य मिले हैं।
क्या ताजमहल पहले से ही मौजूद था जो राजा मानसिंह का महल ( प्रसाद था) ?
ताजमहल से जुड़े कुछ दस्तावेजों के साक्ष्य
19. शाहजहाँ का दरबारी वृत्त शाहजहाँनामा अपने खण्ड एक के पृष्ठ 403 पर कहता है कि अतुलनीय वैभवशाली गुम्बदयुक्त एक भव्य प्रसाद को इमारत‑ए‑आलीशान वा गुम्बज़े (जो राजा मानसिंह के प्रसाद के नाम से जाना जाता था) मुमताज़ को दफनाने के लिए जयपुर के महाराजा जयसिंह से लिया गया।
20. ताजमहल के प्रवेश द्वार के साथ लगे पुरातत्वीय शिलाओं पर हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी आदि भाषाओं में लिखा है कि मुमताज़ की कब्र के रूप में शाहजहाँ ने सन् 1631 से 1653 तक ताजमहल का निर्माण करवाया।
किन्तु उक्त कथन में किसी ऐतिहासिक आधार का तो उल्लेख ही नहीं। यह उसका एक बड़ा दोष है।
दूसरा मुद्दा यह है कि मुमताज़ महल नाम ही झूठा है। मुगली दस्तावेजों में मुमताज़‑उल्‑जमानी नाम उल्लिखित है।
तीसरा मुद्दा यह है कि ताजमहल निर्माण की अवधि जो 22 वर्ष कही गई है वह मुगल दरबार के दस्तावेजों पर आधारित न होकर टॅव्हरनिए नाम के एक फ्रेंच सर्राफ के ऊटपटाँग संस्मरणों से निकाला गया निराधार निष्कर्ष है।
अन्य प्रमाणों का विश्लेषण करने पर टॅव्हरनिए का कथन गलत साबित होता है।
21. अपने पिता शाहजहाँ को लिखा औरंगजेब का पत्र टॅव्हरनिए के दावे को झूठा साबित कर देता है।
औरंगजेब का यह पत्र आदाब‑ए‑आलमगिरी, यादगारनामा और मुरक्का‑ई अकबराबादी (सईद अहमद, आगरा, 1931, पृष्ठ 43, फुटनोट 2) में अन्तर्भूत है।
सन् 1652 के उस पत्र में औरंगजेब ने लिखा है कि मुमताज़ की कब्र परिसर की इमारतें सात मंजिलों वाली थीं और इतनी पुरानी हो गई थीं कि उनमें से पानी टपकता था और गुम्बद के उत्तरी भाग में दरार पड़ी थी।
इससे सिद्ध होता है कि शाहजहाँ के समय में ही ताज इतना पुराना हो गया था कि उसकी तत्काल मरम्मत करनी पड़ी।
22. दिसम्बर 18 सन् 1633 के शाहजहाँ द्वारा महाराजा जयसिंह को भेजे दो पत्र (फरमान) कपड़द्वारा नाम के जयपुर के गुप्त विभाग में सुरक्षित हैं। उन्हें आधुनिक क्रमांक 176‑77 दिये गये हैं।
उन पत्रों में ताजमहल की सम्पत्ति का शाहजहाँ द्वारा अपहरण किये जाने की अपमानकारी घटना उल्लिखित है, जिसे छिपाने के लिए पत्र गुप्त रखे गये।
23. बीकानेर के सरकारी अभिलेखागार में शाहजहाँ द्वारा जयसिंह को भेजे तीन पत्र सुरक्षित हैं। उनमें से एक पत्र में चौथे पत्र का भी उल्लेख है।
इनमें जयसिंह को मकराने का संगमरमर और संगतराश भेजने के लिए कहा गया है।
ताजमहल हड़पने के बाद उसमें मुमताज़ की कब्र बनाने और कुरान की आयतें जड़ाने के लिए शाहजहाँ जयसिंह से ही संगमरमर मँगवा रहा था।
यह देखकर जयसिंह क्रोधित हुआ और उसने न कोई उत्तर दिया, न संगमरमर भेजा।
24. मुमताज़ की मृत्यु के लगभग दो वर्ष के भीतर ही शाहजहाँ ने संगमरमर की माँग करते हुए जयसिंह को तीन आदेश भेजे।
यदि वास्तव में 22 वर्षों में ताजमहल का निर्माण हुआ होता तो 10‑15 वर्षों बाद संगमरमर की आवश्यकता पड़ती, न कि तुरन्त।
बना‑बनाया ताजमहल हथियाने के कारण ही शाहजहाँ को तुरन्त संगमरमर चाहिए था ताकि उसमें कुरान जड़ा सके।
25. इन तीनों पत्रों में ताजमहल, मुमताज़ और उसके दफन का कोई उल्लेख नहीं है। लागत और पत्थर की मात्रा का भी कोई विवरण नहीं है।
इससे स्पष्ट है कि शाहजहाँ को केवल थोड़े से संगमरमर की आवश्यकता थी मरम्मत और कब्र बनाने के लिए।
अल्प मात्रा में प्राप्त संगमरमर से ताजमहल जैसी विशाल इमारत का निर्माण असम्भव था।
इतिहास की सच्चाई क्या है — ये जानना जरूरी है
आप Comment में बताए — आप इसे क्या मानते हो, शिवालय या
अगले भाग‑4 में आपके सामने यूरोपियन पर्यटकों के वृत्तांत के दस्तावेज प्रस्तुत करेंगे जो इसे शिव मंदिर साबित करते हैं...
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PART‑4 ताजमहल नहीं, तेजोमहालय एक शिव मंदिर है।
ताजमहल के बारे में भारतीय दस्तावेजों के साथ ही विदेशी पर्यटकों के भी कई लेख मिले है जो इसे तेजोमहालय साबित करते है।
क्या यह सिर्फ शाहजहां के द्वारा राजा जय सिंह के महल को कब्जाने का षड्यंत्र मात्र था, जिसे ताजमहल नाम दे दिया गया..
यूरोपियन पर्यटकों के वृतांत
पीटर मंडी नाम का एक अंग्रेज पर्यटक शाहजहाँ के काल में आगरा नगर में आया था। इसने निजी संस्मरण लिखे हैं। मुमताज़ की मृत्यु के पश्चात् एक‑डेढ़ वर्ष में ही वह विलायत को लौट गया। तथापि उसने लिखा है कि आगरा नगर तथा आसपास प्रेक्षणीय इमारतों में मुमताज़ तथा अकबर के दफन‑स्थल प्रेक्षणीय हैं।
पीटर मंडी के लेख का सार यह है कि मुमताज़ की मृत्यु के तुरंत बाद ही आगरा में उसका दफन पहले से मौजूद भवनों में हुआ था, न कि किसी नए निर्माण में।
यानी ताजमहल शाहजहाँ द्वारा बनाया गया नया मकबरा नहीं बल्कि पहले से बनी इमारत का उपयोग . द लायट नाम के हालैण्ड के एक अफसर ने उल्लेख किया है कि आगरा के किले से एक मील की दूरी पर शाहजहाँ काल के पूर्व का ही मानसिंह भवन था।
शाहजहाँ के दरबारी इतिवृत बादशाहनामा में उसी मानसिंह भवन में मुमताज़ को दफनाने की बात लिखी गई है।
. तत्कालीन फ्रेंच पर्यटक बर्निए ने लिखा है कि ताजमहल के (संगमरमरी) तहखाने में चकाचौंध करने वाला कोई दृश्य था और उस कक्ष में मुसलमानों के अतिरिक्त किसी अन्य को प्रवेश नहीं करने देते थे।
इससे स्पष्ट है कि वहाँ मयूर सिंहासन, चाँदी के द्वार, सोने के खम्भे इत्यादि थे और ऊपर के अष्टकोणीय कक्ष में शिवलिंग पर पानी टपकने वाला सुवर्ण घट और संगमरमरी जालियों में जवाहरात इत्यादि थे।
इतनी सारी सम्पत्ति हड़प करने के उद्देश्य से ही शाहजहाँ ने मुमताज़ को उस मानसिंह के तेजोमहल में ही दफनाने की धृष्टता तथा दुराग्रह किया ताकि उस बहाने उस इमारत पर कब्जा कर अन्दर की सम्पत्ति लूटी जा सके।
अ.
महाराष्ट्रीय ज्ञानकोप के अनुसार ताजमहल निर्माण कार्य 1631 में आरम्भ होकर 1643 में पूर्ण हुआ — अर्थात 12 वर्ष। जबकि प्रचलित अवधि 22 वर्ष कही जाती है।
एक मुस्लिम विवरण के अनुसार मुमताज़ की मृत्यु 1631 में हुई, ताजमहल निर्माण 1631 में आरम्भ होकर 1648 में पूर्ण हुआ — अर्थात 17 वर्ष। जबकि प्रचलित अवधि 22 वर्ष कही जाती है।
अपनी प्रिय पत्नी की मृत्यु होते ही उसका शोक न मनाकर शाहजहाँ विदेशों से मानचित्र बनवाने में जुट गया।
क्या यह सम्भव है? क्या यह उचित लगता है?
मानचित्र के लिए दूरस्थ विदेशों में सन्देश भेजे गए। वहाँ से बनकर मानचित्र आए। पसन्द भी किए गए। तद्नुसार स्थान ढूंढा गया। निर्माण सामग्री मंगवाई गई। सब कार्य छोड़कर केवल ताजमहल बनाना शेष रहा। क्या यह सम्भव है?
स.
अब मुख्य मुद्दा: 22 वर्ष की अवधि का आधार टॅव्हरनिए नामक फ्रांस के सर्राफ की यात्रा टिप्पणी है। उसने लिखा कि:
> “शाहजहाँ ने मुमताज़ को ताज‑इ‑मकान के निकट दफनाने का कारण यह था कि वहाँ आने वाले विदेशी यात्री उस दफन स्थल की तारीफ करें। आगे वह लिखता है कि वह ताज‑इ‑मकान छह चौक वाला बाजार था। लकड़ी न मिलने के कारण शाहजहाँ को कमानों को ईंटों के ही आधार देने पड़े। कब्र पर जो रकम खर्च हुई उसमें मचाण का खर्चा सर्वाधिक था। कब्र का निर्माण कार्य मेरी उपस्थिति में आरम्भ होकर मेरी उपस्थिति में ही समाप्त हुआ। बीस हजार मजदूर लगातार 22 वर्ष काम करते रहे।”
लेकिन टॅव्हरनिए भारत में पहली बार 1641 में आया, जबकि मुमताज़ 1631 में मरी। अतः उसका दावा झूठा है।
वह कभी लगातार 22 वर्ष भारत में रहा ही नहीं।
निष्कर्ष: उसकी टिप्पणी भ्रमों से भरी है और विश्वास योग्य नहीं।
मजदूर असल में सात मंज़िला इमारतों के कमरों, छज्जों, द्वारों और खिड़कियों को बन्द करने में लगे थे।
सभी विदेशी संस्मरण और भारतीय प्रमाण अलग‑अलग हैं। इससे सिद्ध होता है कि शाहजहाँ ने बना‑बनाया ताजमहल जयसिंह से हड़प लिया।
गोरे अंग्रेजों ने मनघड़ंत इतिहास लिखवाया है और काले अंग्रेज इससे राजनीति करते हैं।
इस पॉइंट 29 निष्कर्ष तीन स्पष्ट बिंदुओं में
1️⃣ निर्माण अवधि का विरोधाभास — अलग‑अलग स्रोतों में ताजमहल की निर्माण अवधि 12 वर्ष, 17 वर्ष और 22 वर्ष बताई गई है। यह विरोधाभास दर्शाता है कि प्रचलित 22 वर्ष की अवधि विश्वसनीय नहीं है।
2️⃣ टॅव्हरनिए की टिप्पणी अविश्वसनीय — उसने दावा किया कि 20 हजार मजदूर 22 वर्ष तक काम करते रहे, पर वह भारत में 1641 में आया और कभी लगातार 22 वर्ष रहा ही नहीं। उसकी टिप्पणी गपशप और भ्रमों से भरी है।
3️⃣ बना‑बनाया भवन हड़पना — मजदूर असल में पहले से बनी सात मंज़िला इमारतों की मरम्मत और बदलाव में लगे थे। इससे सिद्ध होता है कि शाहजहाँ ने नया निर्माण नहीं कराया बल्कि जयसिंह का बना‑बनाया महल हड़प लिया।
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30. जे.ए. मॅण्डेलस्लो ने मुमताज़ की मृत्यु के सात वर्ष पश्चात् Voyages and Travels Into the East Indies नाम के निजी पर्यटन संस्मरणों में आगरा का उल्लेख किया है, किन्तु ताजमहल निर्माण का कोई उल्लेख नहीं किया।
यदि सचमुच 20 हजार मजदूर 22 वर्ष तक निर्माण करते रहते तो वह इसका उल्लेख अवश्य करता।
आलीशान भवन बन रहा हो और पर्यटक वर्णन भी न करे — सम्भव नहीं।
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31. ताजमहल के हिन्दू निर्माण का साक्ष्य देने वाला काले पत्थर पर उत्कीर्ण एक संस्कृत शिलालेख लखनऊ के वस्तु‑संग्रहालय (Museum) के ऊपरितम मंजिल में धरा हुआ है। वह सन् 1155 का है।
उसमें राजा परमर्दिदेव के मन्त्री सलक्षण द्वारा लिखा है कि स्फटिक जैसा शुभ्र इन्दुमौलीश्वर (शंकर) का मंदिर बनाया गया।
वह इतना सुन्दर था कि उसमें निवास करने पर शिवजी को कैलाश लौटने की इच्छा ही नहीं रही।
वह मन्दिर आश्विन शुक्ल पंचमी, रविवार को बनकर तैयार हुआ।
ताजमहल के उद्यान में काले पत्थरों का एक मण्डप था ऐसा एक ऐतिहासिक उल्लेख है। उसी में वह संस्कृत शिलालेख लगा था ऐसा अनुमान है।
उस शिलालेख को कनिंगहम ने वटेश्वर शिलालेख जान‑बूझकर कहा ताकि इतिहासज्ञों को भ्रम में डाला जा सके और ताजमहल के हिन्दू निर्माण का रहस्य गुप्त रहे।
आगरा से 70 मील दूर बटेश्वर में उस शिलालेख के पाए जाने का विवरण कहीं नहीं मिलता।
ऐसा विवरण न मिलने पर भी बटेश्वर शिलालेख कहना अंग्रेजी षड्यन्त्र है।
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32.
शाहजहाँ ने ताजमहल परिसर में जो तोड़‑फोड़ और अदल‑बदल की उसका उल्लेख आर्किओलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (1874) के वार्षिक वृत में मिलता है।
उसमें लिखा है कि आगरा के वस्तुसंग्राहालय के आँगन में जो चौखुंटा काले पत्थर का स्तम्भ है, वह कभी ताजमहल के उद्यान में प्रस्थापित था।
काले रूद्र पत्थर व संस्कृत शिलालेख के पत्थर एक से ही हैं।
लखनऊ संग्रहालय का संस्कृत शिलालेख भी उसी पत्थर का है। इससे स्पष्ट है कि वह भी ताजमहल के उद्यानमण्डप में ही प्रदर्शित था।
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पूरे लेख का निष्कर्ष (26 से 32 तक):
विदेशी यात्रियों के संस्मरण और भारतीय दस्तावेज़ यह दिखाते हैं कि ताजमहल कोई नया निर्माण नहीं था, बल्कि पहले से मौजूद मानसिंह के भव्य महल और मंदिर को शाहजहाँ ने हड़पकर उसमें मुमताज़ को दफनाया।
अलग‑अलग स्रोतों में निर्माण अवधि और विवरण विरोधाभासी हैं, जिससे स्पष्ट है कि प्रचलित 22 वर्ष की कहानी अविश्वसनीय है।
संस्कृत शिलालेख और पुरातत्वीय प्रमाण यह सिद्ध करते हैं कि ताजमहल मूलतः एक शिव मंदिर — तेजोमहालय — था।
अपनी राय कमेंट में जरूर दीजिए… क्या यह ताजमहल है या हमारा तेजोमहालय...
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अगले भाग‑5 में आपके सामने गज प्रतिमाएं, कार्बन 14 जांच, स्थापत्य के सबूत भी प्रस्तुत करेंगे जो इसे शिव मंदिर साबित करते हैं...See more
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