#कौन_से_धातु_के_बर्तन_में_खाने_से_हमारे_शरीर_को_क्या_फायदा_होता_है ?
*#सोने_के_बर्तन_में_खाना_बनाने_के_फायदे*
सोने के बर्तनों में पहले राजा महाराजा खाना खाया करते थे। सोने की क्रोकरी को रॉयल क्रोकरी भी कहा जाता है। हज़ारों साल पुराने आयुर्वेद के अनुसार भी सोने की धातु से बने बर्तनों में खाना खाने, पकाने और पीने के फायदों के बारे में बताया गया है। दिवाली पर अगर आप अपने घर की क्रोकरी बदलने की सोच रहे हैं या धनतेरस से पहले कुछ सोने की चीज़ खरीदने के बारे में सोच रहे हैं तो सोने के बर्तनों के बारे में भी एक बार जान लीजिए क्योंकि इनमें खाना खाने से आपकी कई बीमारियां भी ठीक होती हैं।
इसके अलावा सोने के बर्तन में खाना पकाने से आपके खाने की पौष्टिकता भी बढ़ जाती है। सोने के बर्तन में खाने से आपका दीमाग तेज़ होता है, सांस से संबंधी कोई बीमारी नहीं होती, दिल की बीमारियों में भी फायदेमंद होता है सबसे जरूरी बात ये है कि सोना एक ऐसी धातु है जिसमें पके खाने से आपकी body और mind रिलेक्स हो जाते हैं।
खाना आप किसी भी बर्तन में पकाएं लेकिन आप अगर उसे सोने की प्लेट में परोस कर खाएंगें तो सोने के गुण आपके खाने में भी आ जाएंगें। सोना आपकी त्वचा के लिए भी अच्छा होता है।
सोना गर्म धातु है इसमें खाना बनाने से आपके शरीर को अंदर और बाहर दोनों तरह से फायदा मिलता है यानि अंदर से आप एनर्जेटिक महसूस करते हैं और बाहर से आप खूबसूरत दिखते हैं। सोने का तासीर गर्म होती है इसलिए कहा जाता है कि सर्दियों में इसके अंदर खाना बनाकर खाने से ज्यादा फायदा मिलता है।
खाने में सोने के चम्मच और चाकू का इस्तेमाल करने से आपके खाने में तो सोने के गुण आते ही हैं साथ ही जब चम्मच आपके मुंह में भी जाता है तब आपके खाने के स्वाद के साथ-साथ आपके मुंह में सोने का स्वाद भी चला जाता है और इसके फायदे भी आपके शरीर में पहुंच जाते हैं।
सोने की कटोरी में जब कोई गर्म सब्जी डाली जाती है तब सोने की धातु से जो भाप निकलती है उससे सोने के गुण आपकी सब्जी में भी मिल जाते हैं जो आपकी सेहत के लिए काफी फायदेमंद होते हैं।
सर्दियों में सोने के गिलास में पानी पीने से आपको ठंड की शिकायत नहीं होती। सोने के गिलास में गर्म पानी पीने से दोगुना फायदा मिलता है। दिन में एक से दो बार सोने के गिलास में पानी पीने से चेहरे पर ग्लो भी आता है। ये आपकी आंखों की रोशनी के लिए भी फायदेमंद है।
चांदी एक ऐसी धातु है जो शिशु और बच्चों के लिए बिल्कुल सुरक्षित होती है। यही वजह है कि बच्चों को स्तनपान के बाद ठोस आहार शुरू करने पर चांदी की चम्मच, चांदी के गिलास और प्लेट में खाना खाने की सलाह दी जाती है।चांदी के बर्तन में खाना रखने से खाना लंबे समय तक ताजा भी रहता है। चांदी के बर्तन में भरा पानी पीने से प्यास जल्दी बुझती है और इससे पानी का स्वाद भी अच्छा होता है।
चांदी के बर्तन में खाना रखने से खाना लंबे समय तक ताजा भी रहता है। चांदी के बर्तन में भरा पानी पीने से प्यास जल्दी बुझती है और इससे पानी का स्वाद भी अच्छा होता है।
ऐसा माना जाता है कि चांदी की धातु बच्चों के लिए बिल्कुल सुरक्षित होती है। इससे बच्चे में आगे चलकर प्रजनन तंत्र और नसों से संबंधित कोई बीमारी नहीं होती है। हालांकि, अन्य धातुओं और प्लास्टिक में कई ऐसे टॉक्सिक तत्व सेहत को नुकसान पहुंचा सकते हैं जिसमें कैंसर भी शामिल है। वहींए चांदी के बर्तन में खाना खाने से बच्चे को चांदी की धातु के गुण भी मिलते हैंए इसलिए बेहतर होगा कि आप अपने बच्चे को चांदी के बर्तन में ही खाना खिलाएं।
*लोहे के बर्तन में खाना बनाने से दूर होती है खून की कमी, जानिए और भी कई फायदे*
पुराने समय में लोग भोजन पकाने के लिए मिट्टी और लोहे के बर्तनों का ही यूज करते थे लेकिन समय के साथ नॉन-स्टिक बर्तनों ने इनकी जगह ले ली। मगर लोहे के बर्तनों जैसे कढ़ाई आदि में खाना पकाना सेहत के लिए बेहद फायदेमंद होता है। जब आप लोहे के बर्तनों में खाना पकाती हैं, तो यह धातु की सतह के साथ प्रतिक्रिया करता है। तब इसमें से ऐसे तत्व निकलते हैं, जो एनीमिया के साथ कई हैल्थ प्रॉब्लम्स से छुटकारा दिलाते हैं।
लोहे की कढ़ाई में खाना बनाने से उसमें मौजूद लौह अंश भोजन में युक्त हो जाते हैं। जिससे शरीर को पर्याप्त मात्रा में आयरन मिलता है। आयरन ना केवल शरीर की कोशिकाओं के लिए महत्वपूर्ण पोषक तत्व है बल्कि हीमोग्लोबिन को भी बढ़ाता है। यह लाल रक्त कोशिकाओं (आरबीसी) के विकास में भी मदद करता है।
एक समय था जब लोग भोजन पकाने और परोसने के लिए मिट्टी के बर्तन का इस्तेमाल किया करते थे। लेकिन आगे चलकर यह परंपरा केवल दही की हांडी और मटकों तक सीमित रह गई। आपको बता दें मिट्टी के बर्तन औऱ लोहे की कड़ाही में बने भोजन का एक अलग ही स्वाद और इसके अलग ही फायदे होते हैं।
लोहे की कढ़ाई में खाना बनाने से उसमें मौजूद लौह अंश भोजन में युक्त हो जाते हैं। जिससे शरीर को पर्याप्त मात्रा में आयरन मिलता है। आयरन ना केवल शरीर की कोशिकाओं के लिए महत्वपूर्ण पोषक तत्व है बल्कि हीमोग्लोबिन को भी बढ़ाता है। यह लाल रक्त कोशिकाओं (आरबीसी) के विकास में भी मदद करता है।
लोहे की कड़ाही में आपको कुछ चीजों को बनाने से बचना चाहिए। आमतौर पर आप लोहे की कड़ाही में खट्टी सब्जियों को भूलकर भी ना पकाएं। कढ़ी, रसम, टमाटर की चटनी, सांभर आदि चीजों को तो लोहे की कड़ाही में बनाने की तो सोचें भी नहीं।
साथ ही लोहे की कड़ाही में बने भोजन को ज्यादा देर तक उसमें न छोड़ें इससे आपके भोजन का रंग काला हो जाता है। जिससे खाने में कड़वाहट आने का डर रहता है। इसलिए ज्यादा देर तक कड़ाही में बने हुए भोजन को इसमें ना छोड़े।
लोहे की कड़ाही में भोजन पकाते वक्त ध्यान दें की बर्तन पर जंग ना लगा हो। इसलिए जब भी कड़ाही में खाना पकाने के बाद उसे धो कर रखें, तो उसे सूखे कपड़े से अच्छी तरह साफ करें और उस पर हल्का सरसो का तेल लगाकर रखें। ताकि आपकी कड़ाही में जंग ना लग सके।
*#पीतल*
पीतल के बर्तन में खाना खाने से कई स्वास्थ्य लाभ होते हैं लेकिन इनका इस्तेमाल करते समय खास ख्याल रखने की जरुरत होती है। पीतल के बर्तन में खाने से खून साफ होता है और मेमोरी तेज होती है।
सेहत की दृष्टि से पीतल के बर्तनों में बना भोजन स्वादिष्ट तुष्टि-प्रदाता होता है तथा इससे आरोग्य और शरीर को तेज प्राप्त होता है। पीतल का बर्तन जल्दी गर्म होता है जिससे गैस तथा अन्य ऊर्जा की बचत होती है। पीतल के बर्तन दूसरे बर्तन से ज्यादा मजबूत होते हैं। पीतल के कलश में रखा जल अत्यधिक ऊर्जा प्रदान करने में सहायक होता है।
पीतल अथवा ब्रास एक मिश्रित धातु है। पीतल का निर्माण तांबा व जस्ता धातुओं के मिश्रण से किया जाता है। पीतल शब्द पीत से बना है तथा संस्कृत में पीत का अर्थ पीला होता है तथा धार्मिक दृष्टि से पीला रंग भगवान विष्णु को संबोधित करता है। सनातन धर्म में पूजा-पाठ व धार्मिक कर्म हेतु पीतल के बर्तन का ही उपयोग किया जाता है। वेदों के खंड आयुर्वेद में पीतल के पात्रों को भगवान धन्वंतरि का अतिप्रिय बताया गया है। शास्त्र महाभारत में वर्णित एक वृत्तांत के अनुसार सूर्यदेव ने द्रौपदी को पीतल का अक्षय पात्र वरदानस्वरूप दिया था जिसकी विशेषता थी कि जब तक द्रौपदी चाहे जितने लोगों को भोजन करा दे, खाना घटता नहीं था।
पीतल के पात्रों का महत्व ज्योतिष व धार्मिक शास्त्रों में भी बताया गया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सुवर्ण व पीतल की ही भांति पीला रंग देवगुरु बृहस्पति को संबोधित करता है तथा ज्योतिष सिद्धांत के अनुसार पीतल पर देवगुरु बृहस्पति का आधिपत्य होता है। बृहस्पति ग्रह की शांति हेतु पीतल का उपयोग किया जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ग्रह शांति व ज्योतिष अनुष्ठानों में दान हेतु भी पीतल के बर्तन दिए जाते हैं।
पीतल के बर्तन घर में रखना शुभ माना जाता है। सेहत की दृष्टि से पीतल के बर्तनों में बना भोजन स्वादिष्ट तुष्टि-प्रदाता होता है तथा इससे आरोग्य और शरीर को तेज प्राप्त होता है। पीतल का बर्तन जल्दी गर्म होता है जिससे गैस तथा अन्य ऊर्जा की बचत होती है। पीतल का बर्तन दूसरे बर्तनों से ज्यादा मजबूत और जल्दी न टूटने वाला धातु है। पीतल के कलश में रखा जल अत्यधिक ऊर्जा प्रदान करने में सहायक होता है।
पीतल पीले रंग का होने से हमारी आंखों के लिए टॉनिक का काम करता है। पीतल का उपयोग थाली, कटोरे, गिलास, लोटे, गगरे, हंडे, देवताओं की मूर्तियां व सिंहासन, घंटे, अनेक प्रकार के वाद्ययंत्र, ताले, पानी की टोंटियां, मकानों में लगने वाले सामान और गरीबों के लिए गहने बनाने में होता है।
*#मिट्टी_के_बर्तन_में_खाने_के_फायदे
पुराने समय में लोग खाना पकाने और परोसने के लिए मिट्टी के बर्तनों का इस्तेमाल करते थे। लेकिन समय बदलने के साथ यह परंपरा भी कहीं खो सी गई है। रसोई में रखे मिट्टी के बर्तनों की जगह आज स्टील और एल्युमीनियम के बर्तनों ने ले ली है। लेकिन क्या आप जानते हैं मिट्टी के बर्तनों में पकाया और खाया जाने वाला भोजन सेहत के लिहाज से बेहद अच्छा होता है।
एक समय था, जब घरों में लोग भोजन पकाने और परोसने के लिए मिट्टी के बर्तन इस्तेमाल किया करते थे। लेकिन आगे चलकर वह परंपरा बस दही की हांडी और मटकों तक सीमित रह गई, लेकिन अब यह ट्रेंड फिर से दिखाई दे रहा है। लोगों का रुझान मिट्टी के बने बर्तनों की ओर बढ़ रहा है। ऐसा करना स्वास्थ्य के लिहाज से भी काफी फायदेमंद होता है।
मिट्टी में कई गुण पाए जाते हैं। अधिकांश धातुएं मिट्टी में ही पाई जाती हैं। जब हम मिट्टी के बर्तन में खाना खाते हैं तो अनेक पोषक तत्व जैसे जिंक, मैग्नीशियम, आयरन हमारे शरीर में आते हैं।
मिट्टी के बने बर्तनों में कम तेल का इस्तेमाल होता है। मिट्टी के बने बर्तनों में खाना स्वादिष्ट बनता है। इन बर्तनों में भोजन पकाने से पौष्टकता के साथ-साथ भोजन का स्वाद भी बढ़ जाता है। अपच और गैस की समस्या दूर होती है।
मिट्टी के बर्तन में खाना बनाने से खाने में आयरन, फास्फोरस, कैल्शियम और मैग्नीशियम की मात्रा भी खूब पाई जाती है, जो शरीर के लिए बेहद फायदेमंद होते हैं।
मिट्टी के बर्तनों में होने वाले छोटे छोटे छिद्र आग और नमी को बराबर सर्कुलेट करते हैं। इससे खाने के पोषक तत्व सुरक्षित रहते हैं।
मिट्टी के बने बर्तनों में कम तेल का इस्तेमाल होता है।
मिट्टी के बने बर्तनों में खाना स्वादिष्ट बनता है। इन बर्तनों में भोजन पकाने से पौष्टकता के साथ-साथ भोजन का स्वाद भी बढ़ जाता है।
अपच और गैस की समस्या दूर होती है।
कब्ज की समस्या से मिलती है निजात।
भोजन में मौजूद पोषक तत्व नष्ट नहीं होते हैं।
भोजन का पीएच वैल्यू मेंटेन रहता है, इससे कई बीमारियों से बचाव होता है।
सबसे पहले मिट्टी का बर्तन बाजार से घर खरीदकर लाने के बाद उस पर खाने वाला तेल जैसे सरसों का तेल, रिफाइंड आदि लगाकर बर्तन में तीन चौथाई पानी भरकर रख दें। इसके बाद बर्तन को धीमी आंच पर रखकर ढककर रख दें। 2-3 घंटे पकने के बाद इसे उतार लें और ठंडा होने दें। इससे मिट्टी का बर्तन सख्त और मजबूत हो जाएगा। साथ ही इससे बर्तन में कोई रिसाव भी नहीं होगा और मिट्टी की गंध भी चली जाएगी।
बर्तन में खाना बनाने से पहले उसे पानी में डुबोकर 15-20 मिनट के लिए रख दें। उसके बाद गीले बर्तन को सुखाकर उसमें भोजन पकाएं।
मिट्टी के बर्तन कैसे धोने हैं, इस बात की जानकारी न होने की वजह से कई बार लोग इन्हें खरीदने से भी परहेज करते हैं।मिट्टी के बर्तनों को धोना बहुत ही आसान है। इसके लिए आपको किसी केमिकल युक्त साबुन या लिक्विड की जरूत नहीं होती । आप इन बर्तनों को सिर्फ गर्म पानी की मदद से भी साफ कर सकते हैं। चिकनाई वाले बर्तनों को साफ करने के लिए आप पानी में नींबू निचोड़ कर भी डाल सकते हैं। अगर आप बर्तनों को रगड़कर साफ करना चाहते हैं तो इसके लिए नारियल की बाहरी छाल का इस्तेमाल कर लें।
*#तांबे_के_बर्तन_में_खाने-पीने_के_हैं_अनगिनत_फायदे_कई_बीमारियों_से_रहेंगे_दूर*
प्राचीन काल में भोजन के लिए और पानी पीने के लिए तांबे के बर्तनों का ज्यादा इस्तेमाल होता था, शायद इसलिए पहले के लोग स्वस्थ और तंदरुस्त रहते थे और जल्दी बीमारियों की चपेट में नहीं आते थे।
प्राचीन काल से आयुर्वेद में तांबे के बर्तन में खाया गया खाना सेहत के लिहाज से फायदेमंद माना जाता है. आज भी कई घरों में ज्यादातर लोग पानी पीने के लिए तांबे के बर्तन का इस्तेमाल करते हैं
आयुर्वेद के अनुसार, तांबे के बर्तन में रखे पानी दिल को स्वस्थ बनाकर ब्लड प्रेशर को कम करके कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करता है. तांबे में एंटी-इन्फ्लेमेटरी गुण भी पाए जाते हैं जो शरीर में दर्द और सूजन की समस्या को दूर करते हैं. ऑर्थराइटिस की समस्या से निपटने में भी तांबे का पानी कारगर माना जाता है.
तांबे यानी कॉपर के बर्तन का नियमित रूप से उपयोग करने से पाचन क्रिया दुरुस्त रहती है जिससे पेट दर्द, गैस, एसिडिटी और कब्ज जैसी परेशानियों से निजात मिल सकती है. तांबें में एंटी-एजिंग गुण पाए जाते हैं. इसमें रखे पानी पीने से त्वचा संबंधी समस्याएं दूर होती हैं और त्वचा में चमक आती है.
प्राचीन काल में लोग बैक्टीरिया और वायरस को नष्ट करने के लिए नदियों, झीलों, तालाबों और कुओं में तांबे के सिक्के फेंकते थे, लेकिन आज की पीढ़ी इसके वास्तविक अर्थ को जाने बिना ही सिक्के फेंक देती है. आयुर्वेद के अनुसार, तांबे के बर्तन में रखा गया पानी इसमें पैदा होने वाले बैक्टीरिया को खत्म करके पानी को पूरी तरह से शुद्ध कर देता है.
*#क्यों_फायदेमंद_है_तांबे_के_बर्तन ?*
तांबे में कुछ स्टरलाइजिंग गुण होते हैं। जब भी तांबे के संपर्क में पानी या कोई खाने वाली चीज आती है तो उसमें मौजूद कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। यही कारण है कि इसमें खाने या पानी पीने से गठिया और कैंसर जैसी कई बीमारियों का खतरा टल जाता है।
तांबे के बर्तन में पानी पीने का फायदा
ताबें और पानी के बीच में रासायनिक प्रतिक्रिया होती है, जिससे इसमें एंटी-बैक्टीरियल, एंटी-इंफ्लामेंटरी और कैंसररोधी प्रॉपर्टीज पैदा होती हैं और इसलिए तांबे के बर्तन में रखा पानी पीने से कई बीमारियां दूर हो जाती है।
तांबा पानी को करता है फिल्टर
आज के समय में ज्यादातर समस्याएं दूषित पानी पीने से होती है लेकिन तांबे के स्टरलाइजिंग गुण पानी को शुद्ध करने का काम करते हैं। ऐसे में रोजाना तांबे के बर्तन के पानी से आप इंफैक्शन के खतरे से बचे रहते हैं।
*#तांबे_के_बर्तनों_की_सावधानी*
तांबे के बर्तन में खाना खाना सेहत के लिए काफी फायदेमंद माना जाता है लेकिन वहीं खाने की कुछ ऐसी चीजें भी है जिन्हें तांबे के बर्तन में खाने से सेहत को बहुत नुकसान भी पहुंचता है। सिट्रिक फूड्स, आचार, दहीं, नींबू का रस और छाछ आदि चीजों को तांबे के बर्तन में खाना-पीना नहीं चाहिए। दरअसल, इसमें पाए जाने वाला एसिड खट्टी चीजों के साथ गलत प्रतिक्रिया करते हैं, जिससे घबराहट, जी मचलाना आदि होने के साथ आप फूड पॉइजनिंग हो सकती है।
ज्यादातर घरों में तांबे के जग या गिलास का इस्तेमाल किया जाता है लेकिन ध्यान यह रखें कि इसे कभी भी जमीन पर न रखें वरना आपको इसका कोई भी लाभ नहीं मिलेगा।
*#एल्युमीनियम_के_बर्तन_में_बनाते_हैं_खाना_तो_आज_ही_बदल_लें_ये_आदत_जा_सकती_है_जान*
खाने का स्वाद इस बात पर निर्भर करता है कि उसे किस बर्तन में पकाया गया है. हर बर्तन में बनाए गए खाने का अपना अलग स्वाद होता है. मिट्टी के बर्तन में खाना पकाने का स्वाद अलग होता है वहीं लोहे के बर्तन में खाना पकाने का स्वाद अलग होता है. इसके अलावा मार्केट में और भी कई तरह के बर्तन आते हैं जिनमें से एक है एल्युमीनियम के बर्तन. बहुत से लोग एल्युमीनियम के बर्तन में खाना पकाते हैं. जो आपकी सेहत के लिए काफी नुकसानदायक साबित हो सकता है.
एल्युमीनियम के बर्तन में पकाया गया खाना एल्युमीनियम को सोख लेता है. जिसे खाने से एल्युमीनियम शरीर के अलग-अलग अंगों में जमा हो जाता है. एल्युमीनियम के बर्तन में पके खाने को खाने से हाइपर-एसिडिटी, पेप्टिक अल्सर, अपच, पेट फूलना, त्वचा की समस्याएं आदि हो सकता है.
एल्युमीनियम के बर्तन में पके खाने को खाने से हड्डियां खोखली होने लगती हैं. खाने में शामिल आयरन और कैल्शियम की मात्रा को एल्युमिनियम आसानी से अब्जॉर्ब कर लेता है और यह हड्डियों की बीमारियों का कारण बन जाता है.
*#बुद्धि_नाश*
एल्युमीनियम के बर्तन में पके खाने को खाने से अल्जाइमर रोग का खतरा बढ़ जाता है. इसका लक्षण मेमोरी का कमजोर होना है.
कुछ दिनों पहले अल्झाइमर्स के कुछ मृत रोगियों के पोस्टमॉर्टम से उनके मस्तिष्क में एल्युमिनियम की अस्वाभाविक मात्रा में मौजूदगी की बात पता चली। दुनिया भर में हुए शोधों से यह बात सामने आई है कि मानव शरीर के विभिन्न अंगों में एल्युमिनियम का जमा होना अब एक सामान्य घटना बन गई है। मानव मस्तिष्क, किडनी, लिवर, रक्त यहां तक कि हड्डियों में भी एल्युमिनियम जमा होने के साक्ष्य मिल रहे हैं। जबकि, कुदरती रूप से किसी भी स्वस्थ प्राणी के शरीर में एल्युमिनियम की मात्रा नहीं पाई जानी चाहिए।
एल्युमीनियम खट्टे खाद्य पदार्थों के साथ तेजी से घुल जाता है. एल्युमीनियम के बर्तन में टमाटर, चाय और कॉफी जैसे अम्लीय खाद्य पदार्थों को एल्युमिनियम के बर्तनों में पकाना हमेशा सेहत के लिए बहुत ज्यादा नुकसानदेह साबित होता है.
1.एल्युमीनियम शरीर के लिए बहुत हानिकारक होता है। ऐसे में इसमें पके हुए भोजन को खाने से रोजाना शरीर में करीब 4 से 5 मिलीग्राम एल्युमीनियम जाता रहता है।
2.चूंकि इंसान के शरीर का मेटाबॉलिज्म इतना तेज नहीं होता है कि वो एल्युमीनियम जैसे हार्ड तत्व को बाहर निकाल सके, इसलिए ये शरीर में ही स्टोर होकर रहता है। मगर जब भी हम टमाटर, नींबू या कोई दूसरी खट्टी चीज खाते हैं तो एल्युमीनियम इसके साथ रिएक्शन पैदा करता है।
3.हेल्थ एक्सपर्ट्स के मुताबिक एसिडिकि पदार्थों के खाने से एल्युमीनियम का रिएक्शन होता है। ये बॉडी के लिए नुकसानदायक साबित होता है। इसे शरीर का सिस्टम बर्दाश्त नहीं कर पाता है।
4.ऐसा होने पर किडनी, लीवर की खराबी और हड्डियों की कमजोरी समेत कई बीमारियां हो जाती हैं। समस्या बढ़ने पर व्यक्ति की मौत भी हो सकती है।
5.आयुर्वेद विज्ञान में भी एल्युमीनियम को सबसे खराब धातु माना जाता है। बताया जाता है कि अंग्रेजों ने भारतीय कैदी को सजा देने और उनको जल्द से जल्द मारने के लिए एल्यूमीनियम के बर्तनों में खाना देते थे। जिससे चलते धीरे-धीरे शरीर बेकार हो जाता है।
6.ल्युमीनियम के बर्तनों में पका खाना खाने से हमारा नर्वस सिस्टम प्रभावित होता है। इससे तंत्रिकाएं ठीक से काम नहीं करती हैं। नतीजतन बॉडी और माइंड के बीज तालमेल नहीं बन पाता है।
7.एल्युमीनियम एक हार्ड धातु है। इसके शरीर में जमने से मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है। साथ ही ये लिवर को भी डैमेज कर देता है।
8.ये लिवर में लगे फिल्टर को काट देता है। जिससे एल्युमीनियम की मात्रा तेजी से आंतों और शरीर के दूसरे हिस्सों तक पहुंचने लगती है।
9.इसके लगातार इस्तेमाल से दिमाग पर भी असर पड़ने लगता है। इससे धीरे-धीरे व्यक्ति की याददाश्त कमजोर हो जाती है। इससे मेमोरी लॉस की शिकायत भी हो सकती है।
10.एल्युमीनियम के बर्तनों के इस्तेमाल से व्यक्ति को कैंसर जैसी घातक बीमारी भी हो सकती है। क्योंकि इससे बने बर्तनों में खाना पकाने से भोजन का टेक्सर बदल जाता है। आप इसके रंग और स्वाद में बदलाव देख सकते हैं।
एल्युमिनियम न केवल हमारे स्वास्थ्य और शरीर के लिए एक अनावश्यक पदार्थ है बल्कि जहरीला और घातक भी। शरीर के अनेक घातक रोगों में एल्युमिनियम की मौजूदगी की तरफ अब दुनिया भर के चिकित्सा वैज्ञानिकों का ध्यान जा रहा है। मानव मस्तिष्क से जुड़ा अल्झाइमर्स रोग, किडनी खराब होना, याददाश्त में कमी, त्वचा पर खुजली, सिर के डैंड्रफ आदि समस्याओं में एल्युमिनियम की भूमिका स्पष्ट हो रही है।
एल्युमिनियम के बर्तन से भोजन में एल्युमिनियम का रिसाव दो कारणों से होता है। पहला, प्रेशर कुकर, कड़ाही, देगची आदि में खाना पकाते वक्त जब पक रहे खाद्य पदार्थों को धातु की कलछी या चमचे से चलाया जाता है तो बर्तन का एल्युमिनियम घिसकर खाद्य पदार्थ के साथ मिल जाता है। दूसरा, बर्तन में पक रहे खाद्य पदार्थ, खास कर अम्लीय (खट्टे) वस्तुएं, जैसे टमाटर, कढ़ी आदि ऊंचे तापमान पर एल्युमिनियम से रिएक्ट करते हैं और एल्युमिनियम रासायनिक कंपाउंड के रूप में खाद्य पदार्थों में समा जाता है।
*#कांसे_के_बर्तन_में_खाने_के_फायदे*
आजकल भारतीय घरों में अलग-अलग धातुओं के बर्तन देखने को मिलते हैं, मगर भारत में कांसे के बर्तन में खाना खाना या पानी पीने की परंपरा काफी प्राचीन है।
कांसे के बर्तनों का उल्लेख प्राचीन काल से ही मिलता है। ऐसे बर्तन प्राचीन सभ्यताओं से जुड़े स्थलों जैसे - ईरान, सुमेर, मिस्र तथा हड़प्पा, मोहन जोदड़ो, लोथल समेत भारत के अन्य जगहों पर मिले हैं। उस समय ये बर्तन प्राय ढालकर या चद्दर को पीटकर बनाए जाते थे। धीरे-धीरे इन पर उभारदार काम भी होने लगा था। भारतीय रसोई में तो इनके पात्रों का बहुत अधिक महत्त्व रहा है। किसी जमाने में भारतीय रसोई में कांसे, तांबे, पीतल और मिट्टी के बर्तन ही पाए जाते थे। आज भी कांस्य आदि के बर्तनों का उपयोग अच्छा माना जाता है। कांसे के बर्तन जीवाणुओं और विषाणुओं को मारने की क्षमता रखते हैं। कांसे के बर्तनों में भोजन करना आरोग्यप्रद, असंक्रमण, रक्त तथा त्वचा रोगों से बचाव करने वाला बताया गया है। कब्ज और अम्लपित्त की स्थिति में इनमें खाना फायदेमंद होता है। इन पात्रों में खाद्य पदार्थों का सेवन करना रुचि, बुद्धि, मेधा वर्धक और सौभाग्य प्रदाता कहा गया है तथा यकृत, प्लीहा के रोगों में फायदेमंद है।
प्राचीन काल में निर्माण
आयुर्वेद के रस शास्त्र के ग्रंथों में लगभग आठ भाग ताम्र तथा दो भाग रांगा को मिलाकर कांस्य बनाया जाता था। आज भी सामान्यतया: 79 फीसदी ताम्र एवं 21 फीसदी रांगा मिलाकर कांस्य बनाया जाता है।
*#आयुर्वेद_में_कांस्य*
कांस्य का आयुर्वेद के प्रमुख ग्रंथों चरक संहिता, सुश्रुत संहिता एवं अष्टांग हृदय में बर्तन, घंटी, मूर्तियों के साथ रस शास्त्र में औषध के रूप में अनेक जगह उल्लेख है। आठवीं शती के बाद तो औषध के रूप में कांस्य का प्रयोग अधिक होने लगा था, जो कमोबेश आज तक अनवरत हो रहा है। रस शास्त्र के आयुर्वेद प्रकाश ग्रंथ में कांस्य का निर्माण, प्रकार, शोधन, गुण तथा औषध बनाने के बारे में बताया गया है।
कांसे के बर्तन जीवाणुओं और विषाणुओं को मारने की क्षमता रखते हैं। कांसे के बर्तनों में भोजन करना आरोग्यप्रद, असंक्रमण, रक्त तथा त्वचा रोगों से बचाव करने वाला बताया गया है। कब्ज और अम्लपित्त की स्थिति में इनमें खाना फायदेमंद होता है।
सामाजिक महत्त्व
कांसे के पात्रों का सामाजिक समारोहों व समुदायों में काफी महत्व है। शादी-विवाह के मौके पर आज भी कन्या पक्ष की ओर से वर पक्ष को कांस्य के पात्र में धन, धान्य आदि भरकर सम्मानपूर्वक भेंट किया जाता है। ऐसे अवसरों पर कांसे के कटोरे, थाली, गिलास भेंट करना शुभ माना जाता है। साथ ही जब कन्या विवाह के बाद पहली बार वर के गृह में प्रवेश करती है, उस समय कांसे की थाली से तिलक लगाया जाता है।
कंसारा का अच्छा कदम
आम लोगों को अपनी परंपरा, संस्कृति से जोडऩे और कांस्य के फायदे को आमजन तक पहुंचाने के लिए कंसारा मेटलेक्स ने पीढिय़ों से हासिल ज्ञान और अनुभव के आधार पर कांस्य से जुड़े बर्तनों की शृंखला, मंदिर की घंटी और कांसे के उपहार बाजार में उतारकर इन्हें खास महत्त्व दिया है।
कांस्य के गुण
चिकित्सा के रूप में कांस्य भस्म हल्की, उष्ण तथा शरीर की वसा को कम करने वाली मानी गई है। भस्म तथा अनेक औषधियों के साथ संयोजन करने पर कांस्य कृमि रोग, चर्म रोग, कुष्ठ रोग तथा नेत्र रोगों में गुणकारी माना गया है। कांस्य भस्म से चिन्तामणि रस, नित्यानन्द रस, मकर ध्वज वटी तथा मेघनाथ रस जैसे अनेक आयुर्वेदीय औषध योग बनाए जाते हैं।
कांस्य का धार्मिक महत्त्व
कांस्य का उल्लेख धार्मिक कार्यों में प्राचीन काल से मिलता है। मंदिरों की घंटियां एवं बड़े घंटे कांस्य से बनाए जाते रहे हैं। कांस्य ही ऐसी धातु है जिसकी घंटी या घंटे के रूप में आवाज मृदु, स्निग्ध और तेज स्वर में निकलती है और सुनने में मन को प्रसन्न करती है। पूजा पाठ एवं धार्मिक कार्यों में कांसे की थाली, लोटे आदि का ज्यादा प्रयोग किया जाता है। कांसे के पात्रों का प्रयोग धार्मिक कार्यों में करना शुभ माना जाता है।
*#कांसे_के_बर्तन_में_खाना_खाने_के_स्वास्थ्य_लाभ -*
(1). इम्यूनिटी बूस्टर
आयुर्वेदिक ग्रन्थों के अनुसार, कांसा को 'कांसायम बुद्धिवर्धकम' कहा जाता है, अर्थात् इसे बुद्धि बढ़ाने में लाभदायक माना जाता है। यदि हम कांसे के बर्तनों में अपना खाना खाते हैं या पानी पीते हैं तो इससे खाना व पानी तो शुद्ध होता ही है साथ में इससे हमारी इम्यूनिटी भी बढ़ती है।
(2). लंबे समय तक भोजन गर्म रखता है
कांसे का बर्तन स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है। कांसा हीट का एक अच्छा कंडक्टर है इसलिए यदि आप इसमें कोई गर्म खाने की चीज रखते हैं तो वह लंबे समय तक गर्म रहती है और उसमें उसका पोषण भी ज्यों का त्यों रहता है।।
(3). कीटाणुओं से सुरक्षा
यदि आप कांसे के बर्तनों में खाना रखते हैं तो यदि आपके खाने में कोई जर्म्स या कीटाणु भी होते हैं तो वह कांसा के सम्पर्क में आने के कुछ समय बाद ही खत्म हो जाते हैं और आपका खाना शुद्ध हो जाता है।
(4). दोषों का संतुलन
यदि आप कांसा के बर्तनों में पानी रखते हैं तो उसे 8 घंटे तक ऐसा रखने के बाद पानी पर एक सकारात्मक असर पड़ता है जिससे वह आपके दोषों को संतुलित करने में लाभदायक होता है। भारत में कांस्य की लुटिया में रात को पानी रख कर सोने की व सुबह उठकर उस पानी को पी लेने की मान्यता भी है।
(5). रक्त को शुद्ध करता है
कांसा एसिडिक खाद्य पदार्थों व खट्टी चीजों के साथ रिएक्ट भी नहीं करता है। चूंकि कांसा एक एल्केलाइन मेटल है इसलिए यह हमारे रक्त की शुद्धि करने में भी लाभदायक माना जाता है। इसे रोजाना प्रयोग के लिए भी उपयुक्त माना जाता है क्योंकि यह सालों तक बिना खराब हुए ऐसे ही रह सकता है।
*#कांसे_के_बर्तनों_से_जुड़े_महत्वपूर्ण_तथ्य*
कांसे के बर्तन में पानी पीना और खाना खाने के फायदे, जानिए
आजकल भारतीय घरों में अलग-अलग धातुओं के बर्तन देखने को मिलते हैं, मगर भारत में कांसे के बर्तन में खाना खाना या पानी पीने की परंपरा काफी प्राचीन है।
कांसा को हिंदी में पीतल और अंग्रेजी में ब्रोंज कहा जाता है। आयुर्वेद के अनुसार, कांसा के बर्तन में पानी पीना या खाना बनाने के बहुत सारे लाभ हैं। हालांकि, इसके फायदों को जानने से पहले हमें यह पता होना चाहिए कि कांसा कैसे बनता है? दरअसल, कांसा बनाने के लिए कॉपर (तांबा) व टिन (रांगा) को एक साथ 400 से 700 डिग्री के तापमान पर गर्म कर कांसा का निर्माण किया जाता है। इसके बाद इस धातु को शीट्स के रूप में तैयार किया जाता है और फिर इसे हम जैसी चाहे वैसी शेप दे सकते हैं। कांसे के बर्तन भी बनाए जाते हैं, और ये बर्तन स्वास्थ्य के नजरिए से काफी फायदेमंद होता है। उन्हें बनाने के लिए या उन्हें पॉलिश करने के लिए टैमेरिंड जूस का प्रयोग किया जाता है
यदि कांसे की किसी चीज में कोई डैमेज भी हो जाता है तो वह उसके बाद भी उतना ही मूल्यवान रहता है जबकि अन्य मेटल रिसाइकिल कर दिए जाते हैं और उनकी कीमत बिल्कुल न के बराबर हो जाती है।
कांसे की चीजों को बहुत लम्बे समय से प्रयोग किया जाता आ रहा है। इसे संहिता काल से प्रयोग किया जा रहा है। आयुर्वेदिक रिकॉर्ड्स के अनुसार इस धातु को थेरेपी व चिकित्सा आदि के लिए भी प्रयोग किया जाता है।
इसे आसानी से अन्य धातुओं से अलग किया जा सकता है क्योंकि इसकी एक तीखी आवाज होती है, यह सॉफ्ट होता है और छूने में भी बहुत स्मूथ होता है।
यह हल्का सा ग्रेइश होता है और हर प्रकार की इंप्योरिटी से दूर होता है। इसे गर्म किए जाने पर यह लाल रंग में बदल जाता है।
प्राचीन भारत में एक भी घर ऐसा नहीं होता था जिसमें कांसा के बर्तन न हों। आज भी कुछ लोग इस परंपरा को फॉलो कर रहे हैं। हमें भी इस पुरानी प्रथा को फिर से जागृत करना चाहिए और अपने बेहतर स्वास्थ्य के लिए कांसे के बर्तनों का प्रयोग करना चाहिए।
*"#एल्युमिनियम_बर्तन_हमारे_लिए_साइलेंट_किलर"*
भोजन में इस तरह घुला हुआ एल्युमिनियम हमारे पेट में पहुंचकर रक्त के जरिए शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुंच जाता है। एल्युमिनियम की मात्रा यदि थोड़ी हो और वह खाने के जरिए कभी-कभार शरीर में पहुंचे तो किडनी उसे छानकर शरीर से बाहर निकाल देता है। लेकिन, मात्रा अधिक हो और वह लंबे समय तक लगातार शरीर में जाता रहे तो उसे छानकर बाहर निकालना किडनी के वश में नहीं रह जाता। ऐसा होने पर एल्युमिनियम शरीर के विभिन्न अंगों में जमा होने लगता है। मस्तिष्क, किडनी, लिवर और हड्डियों सहित शरीर के अन्य अंगों की कोशिकाओं में इसका संचय होता है। सबसे बड़ा खतरा मस्तिष्क और किडनी को होता है। एल्युमिनियम को शरीर से बाहर निकालने वाली किडनी स्वयं इसका शिकार हो जाती हैं।
शरीर में संचित एल्युमिनियम के कारण होने वाले प्रमुख समस्याएं हैं- अल्झाइमर्स, किडनी फेल्योर, लिवर समस्या, पेट की गड़बड़ी, हड्डियों का कमजोर होना, कमजोर याददाश्त, त्वचा पर खुजली, सिर में डैंड्रफ (खुश्की) आदि। जाहिर है, शिशु और बच्चों के ऊपर एल्युमिनियम का असर अधिक घातक होगा।
#राजीव दीक्षित अमर रहे