संजीव जैन's Album: Wall Photos

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मैं बराबर सोचता रहा कि क्‍या कोई ऐसा उपाय नहीं हो सकता कि समाज से पैसे का राज खतम हो जाय। हमारे समस्‍त बड़े प्रयत्‍न इस एक चट्टान से टकरा कर चूर हो जाते हैं। क्‍या कोई ऐसी व्‍यवस्‍था हो सकती है, जिसमें प्रत्‍येक व्‍यक्ति अपने मतलब भर का पैसा पा जाय और उससे अधिक पा सकने का कोई उपाय ही न हो? यदि ऐसा हो सकता तो वह समूचा बेहूदा साहित्‍य लिखा ही न जाता, जो केवल पंथों और उनके प्रवर्तकों की महिमा बढ़ाने के उत्‍साह में बराबर उन बातों को ढकने का प्रयत्‍न करता है, जिन्‍हें पंथ के प्रवर्तक ने कठिन साधना से प्राप्‍त किया था। ... क्‍या कोई ऐसी सामाजिक व्‍यवस्‍था नहीं बन सकती, जिसमें 'घर जोड़ने की माया' जीती भी रहे और सत्‍य के मार्ग में बाधक भी न हो?

मेरा मन कहता है कि यह संभव है।

-- हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबन्ध -- घर जोड़ने की माया निबन्ध का आखिरी अंश...