Nalini Mishra
*भगवान राम के आदर्श आपके जीवन को सुशोभित करे व आपका जीवन राममय बने*।
*रामनवमी की हार्दिक शुभकामनाएँ*।
प्रफुल्ल के नागड़ा (जैन)
गाय, गोबर और गौमूत्र का उपहास उड़ाना हमारे देश में एक आम बात बन चुकी है। जब भी इनकी उपयोगिता पर बात होती है, तो अक्सर इसे गंभीरता से लेने के बजाय इसका मजाक बनाया जाता है। लेकिन जमीनी हकीकत इस संकीर्ण सोच से परे एक बेहद उम्मीद जगाने वाले ‘इकोनॉमिक मॉडल’ को दर्शाती है।
आज उत्तर प्रदेश में देसी गायों के गोबर और गौमूत्र का इस्तेमाल करके करीब 200 तरह के प्रोडक्ट्स तैयार किए जा रहे हैं, जिनकी इंटरनेशनल मार्केट में भारी डिमांड है। इसमें शैम्पू, साबुन और अर्क से लेकर ऑर्गेनिक फर्टिलाइजर तक शामिल हैं। जिस चीज को बेकार मानकर बहा दिया जाता था, आज वही किसानों के लिए अतिरिक्त नकद आय का एक मजबूत जरिया बन चुकी है।
बाजार में बिकने वाला महंगा ऑर्गेनिक फूड इसी प्राकृतिक खाद और गौमूत्र से बने जैविक पेस्टिसाइड्स के दम पर उगता है, जो मिट्टी को जहर-मुक्त और उपजाऊ बनाने का काम करते हैं।
इसका एक प्रत्यक्ष और सफल मॉडल उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में देखा जा सकता है। वहाँ FPO यानी फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशन के ज़रिए 15 गाँवों के स्थानीय संग्रह केंद्रों से रोज 500 लीटर गौमूत्र 10 रुपए प्रति लीटर के हिसाब से खरीदा जा रहा है।
इसके भंडारण के लिए गाँवों में 200 लीटर क्षमता वाले टैंक लगाए गए हैं। इस पूरी व्यवस्था से गाँव की लगभग 300 महिलाएँ जुड़ी हुई हैं, जिन्हें प्रति लीटर 2 रुपए का कमीशन मिलने के साथ-साथ FPO में शेयरहोल्डर भी बनाया गया है।
इस पूरे मॉडल ने किसान के पास मौजूद गाय को एक ‘थ्री-इन-वन’ इकोनॉमिक इंजन में बदल दिया है। किसान को दूध से सीधी कमाई होती है, गोबर से खेत के लिए मुफ्त खाद मिलने के कारण रासायनिक खाद का खर्च शून्य हो जाता है, और गौमूत्र की बिक्री से प्रति लीटर नकद मुनाफा मिलता है।
बुलंदशहर के 15 गाँवों से शुरू हुआ यह प्रयोग अगर पूरे राज्य में लागू होता है, तो यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था का कायाकल्प कर सकता है। ऐसे में सवाल उन लोगों से है जो गाय, गोबर और गौमूत्र का नाम सुनते ही मजाक बनाने लगते हैं- जब यही व्यवस्था किसान का खर्च घटाकर उसकी आय बढ़ा रही है और रोजगार के नए साधन बना रही है, तो उपहास किस बात का है?
स्पष्ट है कि समस्या गोबर या गौमूत्र में नहीं, बल्कि उस सोच में है जो किसी संसाधन की उपयोगिता समझे बिना उसका मजाक उड़ाने लगती है।
opindia से कॉपी पेस्ट
Mitrangshu Pinaki
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স্কুলে এক শিক্ষক ছাত্রছাত্রীদের বললেন, ভবিষ্যতে তারা কী হতে চায় আর কী হতে চায় না — সে সম্পর্কে লিখতে।
এক ছোট্ট শিশুর উত্তর সবার মুখে হাসি ফোটাল।
তার নিষ্পাপ কল্পনায়, “সিনিয়র সিটিজেন” হওয়াটাই ছিল জীবনের সবচেয়ে আনন্দময় ও মজার সময়! \ud83d\ude04
শিশুটি লিখলঃ
“আমি রাষ্ট্রপতি হতে চাই না,
ডাক্তার হতে চাই না,
বা বিজ্ঞানীও হতে চাই না…
এগুলোর কোনোটাই না।
আমার সবচেয়ে বড় ইচ্ছা হলো একজন সিনিয়র সিটিজেন হওয়া,
কারণ ওটাই সবচেয়ে মজার জীবন বলে মনে হয়!”
কারণ আমার দাদু —
\ud83d\ude04 সকালে দেরি করে ঘুম থেকে উঠতে পারেন।
\ud83d\ude04 যখন খুশি দুপুরে ঘুমিয়ে নিতে পারেন।
\ud83d\ude04 শান্তিতে টিভি দেখেন আর সন্ধ্যাবেলাতেই ঘুমিয়ে পড়েন।
\ud83d\ude04 কোনো হোমওয়ার্ক নেই, পরীক্ষা নেই, টিউশন নেই।
\ud83d\ude04 কাজ না থাকলে গাছের নিচে বসে ঠান্ডা হাওয়া উপভোগ করেন, বা পার্কে গিয়ে বন্ধুদের সঙ্গে দাবা খেলেন।
\ud83d\ude04 যতক্ষণ ইচ্ছে ভিডিও গেম খেলতে পারেন, কেউ বকাবকি করে না।
\ud83d\ude04 সকালে কফি, বিকেলে চা, সন্ধ্যায় দুধ — জীবন একেবারে দারুণ!
\ud83d\ude04 বাসে অনেকে ভালোবেসে সিট ছেড়ে দেয়।
\ud83d\ude04 যা খেতে ভালো লাগে তাই খেতে পারেন, কেউ বাধা দেয় না।
\ud83d\ude04 যা ইচ্ছে তাই করতে পারেন — গান গাওয়া, নাচ, ছবি আঁকা, পিয়ানো বা ট্রাম্পেট বাজানো, পাহাড়ে চড়া বা ট্রেকিং করা।
\ud83d\ude04 আর পকেটে টাকা থাকলে যেখানে খুশি ঘুরতে যেতে পারেন!
“তাই, সিনিয়র সিটিজেন হওয়া সত্যিই অসাধারণ!” \ud83d\ude04
\ud83d\udca1 অনুপ্রেরণা:
অনেক সময় সিনিয়র সিটিজেনরাই বুঝতে পারেন না যে তাঁরা আসলে কতটা সৌভাগ্যবান এবং স্বাধীন।
\ud83c\udf39 গ্রুপে সিনিয়র সিটিজেনদের প্রতি ভালোবাসা ও শ্রদ্ধার সঙ্গে উৎসর্গ করা হলো। \ud83d\ude4f\ud83c\udf39
(সংগৃহীত)
Priyanshu Rai
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
Jayendra singh
(owner)
कोरोना काल में आपकी प्राथमिकता होनी चाहिए की आप कैसे स्वयं को सुरक्षित रख सकते हैं। कोरोना से जुड़ें सभी सुरक्षा नियमों का पालन करें और अपनों से भावनात्मक तरह से जुड़ें रहें।
Rahul Pandey
इस ऐप को अधीक से अधीक लोगों को शेयर करे और फेसबुक को बैन करवाना हैं।
जय भारत