NRC का विरोध; देश हित को तिलांजलि

  • NRC का विरोध; देश हित को तिलांजलि

    असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) का अंतिम ड्रॉफ्ट जारी होने के बाद से विपक्ष हमलावर हो गया है और संसद में जमकर हंगामा हो रहा है। दरअसल, असम के नागरिक के रूप में 40 लाख लोगों का नाम इसमें नहीं है। इसमें शामिल होने के लिए 3.29 करोड़ लोगों ने आवेदन किया था, जिसमें से 2.89 लाख लोगों को शामिल किया गया। यहां यह जानना जरूरी है कि ये पूरा मसला क्या है।
    दरअसल, एनआरसी से पता चलता है कि कौन भारतीय नागरिक है और कौन नहीं। जिनके नाम इसमें शामिल नहीं होते हैं, उन्हें अवैध नागरिक माना जाता है। इसके हिसाब से 25 मार्च, 1971 से पहले असम में रह रहे लोगों को भारतीय नागरिक माना गया है। असम पहला राज्य है, जहां भारतीय नागरिकों के नाम शामिल करने के लिए 1951 के बाद एनआरसी को अपडेट किया जा रहा है। एनआरसी का पहला मसौदा 31 दिसंबर और 1 जनवरी की रात जारी किया गया था, जिसमें 1.9 करोड़ लोगों के नाम थे।

    असम में बांग्लादेश से आए घुसपैठियों पर बवाल के बाद सुप्रीम कोर्ट ने एनआरसी अपडेट करने को कहा था। पहला रजिस्टर 1951 में जारी हुआ था। ये रजिस्टर असम का निवासी होने का सर्टिफिकेट है। इस मुद्दे पर असम में कई बड़े और हिंसक आंदोलन हुए हैं। 1947 में बंटवारे के बाद असम के लोगों का पूर्वी पाकिस्तान में आना-जाना जारी रहा। 1979 में असम में घुसपैठियों के खिलाफ ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन ने आंदोलन किया। इसके बाद 1985 को तब की केंद्र में राजीव गांधी सरकार ने असम गण परिषद से समझौता किया। इसके तहत 1971 से पहले जो भी बांग्लादेशी असम में घुसे हैं, उन्हें भारत की नागरिकता दी जाएगी। हालांकि इस पर काम शुरू नहीं हो सका। 2005 में जाकर कांग्रेस सरकार ने इस पर काम शुरू किया। 2015 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर इसमें तेजी आई। इसके बाद असम में नागरिकों के सत्यापन का काम शुरू हुआ। राज्यभर में एनआरसी केंद्र खोले गए। असम का नागरिक होने के लिए वहां के लोगों को दस्तावेज सौंपने थे।

    अब सवाल ये है कि जिनके नाम इसमें नहीं हैं उनका क्या होगा? दरअसल अभी उनके पास एक और मौका है। छूटे हुए लोग फिर से इसमें शामिल होने के लिए अप्लाई कर सकते हैं। इसके लिए उनके पास 30 अगस्त से 28 सितंबर तक समय है। केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि हो सकता है कि कुछ लोग अनिवार्य दस्तावेज जमा ना करा पाए हों तो उन्हें दावों और आपत्तियों की प्रक्रिया के जरिए पूरा मौका दिया जाएगा। दावों और आपत्तियों के निस्तारण के बाद ही अंतिम एनआरसी जारी किया जाएगा और यहां तक कि इसके बाद भी हर व्यक्ति को विदेशी न्यायाधिकरण का दरवाजा खटखटाने का मौका मिलेगा। अंतिम एनआरसी 31 दिसंबर से पहले जारी की जा सकती है।
    एनआरसी के फाइनल ड्राफ्ट में जो भी कमियां हों, लेकिन याद रखना होगा कि यह सिर्फ ड्राफ्ट है, अंतिम सूची नहीं। यानी कमियों को दूर करने का मौका अभी बाकी है। यहां खास बात यह भी है इस पूरी प्रक्रिया का किसी राजनीतिक दल या सरकार से सीधे कोई वास्ता नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर और उसकी देखरेख में यह कार्य किया जा रहा है। इसके बावजूद इस मुद्दे को राजनीतिक रंग दिया जा रहा है। केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने यही बात बीते सोमवार को लोकसभा में कही भी, लेकिन अगले दिन बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने राज्यसभा में एकदम अलग तेवर दिखाते हुए कहा कि एनआरसी का आइडिया तो राजीव गांधी सरकार का ही था, लेकिन इसे लागू करने का साहस बाद की किसी सरकार में नहीं था। चूंकि हममें साहस है इसलिए हम इसे लागू कर रहे हैं। कोर्ट ने कहा है कि जिन लोगों के नाम ड्राफ्ट में नहीं हैं, उनके दावों की जांच के लिए निष्पक्ष मानक बनाए जाएं।  पश्चिम बंगाल की सीएम और तृणमूल चीफ ममता बनर्जी ने देश में गृहयुद्ध शुरू होने की बात कह दी, जिसे लेकर उनके खिलाफ तत्काल एफआईआर भी दर्ज हो गई। ऐसी बात-बहादुरी से देश का माहौल गर्म होता है, जिसका एक या दूसरे दल को चुनावी फायदा भी मिल सकता है। लेकिन घुसपैठ की गंभीर समस्या से निपटने में इससे कोई मदद नहीं मिलने वाली, उलटे इसे हल करना और मुश्किल ही होने वाला है।

    एनआरसी की खास बातें :

    • एनआरसी के मुताबिक, जिस व्यक्ति का नाम सिटिजनशिप रजिस्टर में नहीं होता है उसे अवैध नागरिक माना जाता है। इसे 1951 की जनगणना के बाद तैयार किया गया था। इसमें यहां के हर गांव के हर घर में रहने वाले लोगों के नाम और संख्या दर्ज की गई है।
    • एनआरसी की रिपोर्ट से ही पता चलता है कि कौन भारतीय नागरिक है और कौन नहीं है। आपको बता दें कि वर्ष 1947 में भारत-पाकिस्‍तान के बंटवारे के बाद कुछ लोग असम से पूर्वी पाकिस्तान चले गए, लेकिन उनकी जमीन असम में थी और लोगों का दोनों और से आना-जाना बंटवारे के बाद भी जारी रहा। इसके बाद 1951 में पहली बार एनआरसी के डाटा का अपटेड किया गया।
    • इसके बाद भी भारत में घुसपैठ लगातार जारी रही। असम में वर्ष 1971 में बांग्लादेश बनने के बाद भारी संख्‍या में शरणार्थियों का पहुंचना जारी रहा और इससे राज्‍य की आबादी का स्‍वरूप बदलने लगा। 80 के दशक में अखिल असम छात्र संघ (आसू) ने एक आंदोलन शुरू किया था। आसू के छह साल के संघर्ष के बाद वर्ष 1985 में असम समझौत पर हस्‍ताक्षर किए गए थे।
    • इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार, उसकी देखरेख में 2015 से जनगणना का काम शुरू किया गया। इस साल जनवरी में असम के सिटीजन रजिस्‍टर में 1.9 करोड़ लोगों के नाम दर्ज किए गए थे, जबकि 3.29 आवेदकों ने आवेदन किया था।
    • असम समझौते के बाद असम गण परिषद के नेताओं ने राजनीतिक दल का गठन किया, जिसने राज्‍य में दो बार सरकार भी बनाई। वहीं 2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 1951 के नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजनशिप को अपडेट करने का फैसला किया था। उन्होंने तय किया था कि असम में अवैध तरीके से भी दाखिल हो गए लोगों का नाम नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजनशिप में जोड़ा जाएगा, लेकिन इसके बाद यह विवाद बहुत बढ़ गया और मामला कोर्ट तक पहुंच गया।

    स्पष्ट है कि असम कि भाजपा सरकार ने माननीय प्रधानमंत्री के नेतृत्व में देशहित में उच्चतम न्यायलय के आदेश का पालन किया है. मामला स्पष्ट होने के बाद भी विपक्ष के लोग निजी स्वार्थ के लिए देशहित को तिलांजलि दे रहे है और देश उनको कभी माफ़ नहीं करेगा!

    जय हिन्द.

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